निर्भाया के अंतर्मन से “ज़िंदगी के अखिरी लम्हे “

मेरी उमंगो को सुलाया है किसी ने
मेरी तरंगो को दबाया है किसी ने
ये खुदा ! तू बता क्या ज़ुर्म किया था ??
मैंने भी संजोये थे कई सपने दिल मे
फिर भी मुझको कुछ ना मिला मिलके
काश ! वो रात होती ना
मेरी ज़िंदगी उस जगह सोती ना
मैं भी जीती गैरो की तरह
हुस्न मे वो आग गर होती ना !
फिर भी सपनो की खातिर मैंने मरना ना चाहा
मेरे सपनो ने मुझे हिम्मत से उठाना चाहा
मेरे सपनो मे ना थी हिम्मत की लड सके खुदा से
बस उसने कहा, चल अब तू जा इस जहाँ से
दुआ यही करुंगा फिर से आयेगी इस जहाँ मे
तू अखण्ड ज्योती से झायेगी इस जहाँ मे
बस ये बाते सुन कर सपनो की
मेरी अखिरी सांसे मुझे बोझ सी लगी
“बस छोड दी सांसे ये सोच कर
सोच बदल जायेगी मेरे जाने के बाद”

जग से नाते टूट गये
कई रिश्ते हम से छूट गये
हमने सोचा था एक नयी क्रांती आयेगी
पर हमे क्या पता था की हमको सब भूल गये
उम्मीद सिर्फ इतनी थी कि
आप हमको दिल मे याद रखोगे
जब भी सोचोगे तो एक ख्याल रखोगे
“की हम भी एक अच्छे व्यकितत्व मे हो
दमिनी जैसी बेटिया अस्तित्व मे हो
हर बेटी अडिग अस्तित्व मे हो”

कि सुबह फिर से आयी है !

बता दो बात जो जहन मे है कि सुबह फिर से आयी है,
तेरे चेहरे को देखू तो कुछ छुपा-छुपा सा लगता है !
नही पसंद मुझको है रहस्य इन इश्क के मोहल्लों मे,
ना जाने क्यू कोई शख्स खफा-खफा सा लगता है!!
कोई ज़रिया कोई उम्मीद दे दो कि सुबह फिर से आयी है,
बता दो बात जो जहन मे है कि सुबह फिर से आयी है,
आज कल आखों की बातें आखों से ना हो रही है,
क्या बात है मेरा प्यार बटा-बटा सा लगता है !!
बात जिसकी मेरे दिल को समा गयी,
वो आज ना जाने क्यू अमल मे बेवफा सा लगता है!
बता दो बात जो जहन मे है कि सुबह फिर से आयी है,
तेरे चेहरे को देखू तो कुछ छुपा-छुपा सा लगता है !!

वो लडकी !

“मैं कभी भी उस जैसी लडकी से नही मिला. उसकी बडी-बडी आखें बिल्कुल जैसे सितारों का समंदर हो.जब कभी वो मुझ से बात करती तो मुझे ऐसा एहसास होता है कि मैं कायनात की सबसे नायाब और सबसे खूबसूरत प्राणी से बात कर रहा हूं.बदलों के गुच्छे से भी कोमल,किसी बच्चे की हंसी के तरह मासूम. वह बहोत टूट जाती है जब कभी जब बहोत तेज़ हंसती है तब उसके आंखों से बिल्कुल शुध्द पानी की बारिश गालो पर हो जाती है.उसकी उपमा हर कवि करता है और उसकी सुंदरता हर कविता मे समाहित है. शायद किसी रोज़ वो अपनी कीमत समझे,शायद कभी जान पाये कि वो दुनिया के लिये कितनी नायाब है क्यूकी वो उस तरीके की लडकियों की जैसी नही जिन्हे मैं प्रत्येक दिन सडकों मे देखा करता हूं वो तो वो लडकी है जिसके बारे मे मैं किताबों मे पढा करता हूं !!”

रूबरू-ए-ज़िंदगी !

सपने, ख्वाब, विजन,बडे असान दिखते हैं बंद आंखों मे लेकिन
जब ज़मीनी हक़ीक़त मे उतर जाते हैं तब ये उतने मुश्किल लगते हैं !!
तब हमें अपनों और अपने भरोसे की ज़रुरत होती है….
एक लम्हा रुक कर पल्कें मूंद कर दिल की अवाज़
सुनना ज़रुरी होता है और उम्मीद से ज्यादा सच्चाई पर भरोसा करना होता है !!
“ बहोत उतार चढाव हैं इस जिंदगी के सफर में….
इंसान समझ कर भी सफर का हमसफर नही बनता ” !!

नजरों की भाषा !

कोमल सा एह्सास मेरे दिल मे क्यू है आज
किसी ने देखा पहली बार ,
हाये किस अदा के साथ
फिर वो अंजान बनने की कोशिश …
फिर उसमे उनकी हार ,
फिर उसको छुपाने का उनका वो अंदाज़
बार बार उनकी हार, बार बार बडता प्यार !!kumarvishwas 037

नही अच्छा !

नही बदलोगे तुम मुझे ही बदलना है,
तेरे ये मसूम रुठने पर मेरा मुस्कराना नही अच्छा !
अब वक्त और दस्तूर वो नही जो पहले था,
ये कहू की मैं भी तुम जैसा हू तो या बहाना नही अच्छा !
अब सोचती हो तुम किसी और की होकर के की
मोह्ब्बत भी निभा लू तो,
यू होश मे रेहकर लडखडाना नही अच्छा !
दिल टूट ही जाये तो ही आराम है वर्ना,
अब वफा की रस्म निभाई तो जमाना नही अच्छा !
मज़बूरियों की मंजिले बन गयी दुनियां मे बे-हिसाब,
अब अपने प्यार का घर पुराना नही अच्छा !
चल खुदा हफिज़ तुझ को,
सात फेरों के वचन निभा अब तू,
यूं बच्चों की तरह ला-हासिल ख्वाब सज़ाना नही अच्छा !!

दिवाली का एक दिया !

दिवाली का एक दिया लेकर
चला जब राहों पर
बुझा वो हर एक चौघट पर
ना जाने क्यु ना जाने क्यु ?
दिये मे खोंट थी शायद
पैरों मे चोट थी शायद
या बदलते जमाने मे
हवाओं कि झोंक थी शायद
दिवाली का एक दिया बुझता रहा पल पल
ना जाने क्यु ना जाने क्यु
हथेली से बचाऊ तो हाथ मेरा था जल जाता
हथेली को हतऊ तो दिया हवाओं से बुझ जाता
मैं फिर से जलाता उसको और फिर चल देता
इस आस से की कोई मेहफूज़ मिलेगा रस्ता
मगर वो दिया बुझ बुझ कर
बुझता रहा पल पल
मेरी हर लाख कोशिश को नकामी मिली हर पल
बडा हैरान होकर मैं
बडा परेशान होकर मैं
दिये को रख आया
अंधेरे बंद कमरे के इक कोने पर
ना जाने क्यु ? ना जाने क्यु ?
दिवाली का एक दिया लेकर ………