नही अच्छा !

नही बदलोगे तुम मुझे ही बदलना है,
तेरे ये मसूम रुठने पर मेरा मुस्कराना नही अच्छा !
अब वक्त और दस्तूर वो नही जो पहले था,
ये कहू की मैं भी तुम जैसा हू तो या बहाना नही अच्छा !
अब सोचती हो तुम किसी और की होकर के की
मोह्ब्बत भी निभा लू तो,
यू होश मे रेहकर लडखडाना नही अच्छा !
दिल टूट ही जाये तो ही आराम है वर्ना,
अब वफा की रस्म निभाई तो जमाना नही अच्छा !
मज़बूरियों की मंजिले बन गयी दुनियां मे बे-हिसाब,
अब अपने प्यार का घर पुराना नही अच्छा !
चल खुदा हफिज़ तुझ को,
सात फेरों के वचन निभा अब तू,
यूं बच्चों की तरह ला-हासिल ख्वाब सज़ाना नही अच्छा !!

दिवाली का एक दिया !

दिवाली का एक दिया लेकर
चला जब राहों पर
बुझा वो हर एक चौघट पर
ना जाने क्यु ना जाने क्यु ?
दिये मे खोंट थी शायद
पैरों मे चोट थी शायद
या बदलते जमाने मे
हवाओं कि झोंक थी शायद
दिवाली का एक दिया बुझता रहा पल पल
ना जाने क्यु ना जाने क्यु
हथेली से बचाऊ तो हाथ मेरा था जल जाता
हथेली को हतऊ तो दिया हवाओं से बुझ जाता
मैं फिर से जलाता उसको और फिर चल देता
इस आस से की कोई मेहफूज़ मिलेगा रस्ता
मगर वो दिया बुझ बुझ कर
बुझता रहा पल पल
मेरी हर लाख कोशिश को नकामी मिली हर पल
बडा हैरान होकर मैं
बडा परेशान होकर मैं
दिये को रख आया
अंधेरे बंद कमरे के इक कोने पर
ना जाने क्यु ? ना जाने क्यु ?
दिवाली का एक दिया लेकर ………